भूगोल का विकास

 

भूगोल का विकास इतिहास लेखन से ही प्रारंभ हो जाता है सर्वप्रथम लोगों ने अपने आसपास के बारे में लिखना प्रारंभ किया अर्थात लोगों ने अपने आसपास जो घटनाएं घट रही थी उनके बारे में लिखना शुरू किया, उसके बाद में दूर देश के बारे में भी लिखने का साहस किया।

ईसा से लगभग 10 शताब्दी पूर्व लिखे गए अथर्ववेद में हमें पृथ्वी और उसके जैविक लक्षण एवं मानव बस्तियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

यूनानी, चीनी एवं अरबी यात्री द्वारा विभिन्न स्थानों की यात्रा की गई और इसी दौरान विभिन्न नये नये स्थानो के बारे में लिखा गया, वास्तव में यह ही अज्ञात देशों के खोजकर्ता थे। यह अपनी संस्कृति और धर्म के प्रचार प्रसार के लिए नए नए स्थानों की यात्रा करते थे और उनके बारे में लिखते थे । इसी दौरान कई सारी सभ्यताएं एक साथ मिली, विकसित और विकास किया। इसी से विविधता में एकता की उत्पत्ति होती है , जिसके बीच आज भी दक्षिणी पूर्वी एशिया विशेषकर भारत में स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं।

    छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मिलिटेस निवासी "थेल्स" ने पृथ्वी के आकार व आकृति का वर्णन किया।

दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में "टॉलमी" ने मानचित्र बनाने तथा किसी स्थान की स्थिति को दर्शाने के लिए अक्षांश व देशांतर का ज्ञान प्रदान किया।

प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में "स्ट्रेबो" ने 17 घंटों में विश्व का विस्तार से वर्णन किया।

भारतीय भूगोलवेत्ता अपने समय से बहुत आगे थे । *आर्यभट्ट* ने कॉपरनिकस से लगभग 100 वर्ष पूर्व ही सूर्य केंद्रित अवधारणा दे दी थी।

यही नहीं बल्कि भास्कराचार्य ने भी न्यूटन से लगभग 1200 वर्ष पूर्व ही पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में बता दिया था।

कालिदास ने मेघदूत में मध्य भारत के भूगोल का बहुत ही सटीक वर्णन किया है।

 अरब के लोगों ने भी इस दिशा में पर्याप्त योगदान दिया है और प्राप्त ज्ञान को बड़े क्षेत्रों में प्रकाशित कर दिया ।

14 वीं शताब्दी में इब्नबतूता ने भारत की यात्रा की और भारत भूमि तथा उसके लोगों के बारे में विस्तृत विवरण दिया।

14 से 18 वीं शताब्दी के दौरान नई-नई देशों की खोज तथा समुद्री मार्ग की खोज हुई जिसके परिणाम स्वरूप यूरोप के बहार विश्व के विभिन्न स्थानों तथा लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई , इससे यूरोप के लोगों को अधिक जनसंख्या वाले यूरोप से कम जनसंख्या वाले अमेरिका, आस्ट्रेलिया , तथा अफ्रीका में प्रवास करने में मदद मिली। इसी से यूरोप के लोगों को संसाधन समृद्धि देशों के ऊपर आर्थिक व राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने में मदद मिली।

18 वीं शताब्दी के अंत तक विभिन्न स्त्रोतों द्वारा प्राप्त भौगोलिक जानकारी का वैज्ञानिक विश्लेषण करने का प्रयास किया गया जिसमें 2 व्यक्तियों का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है जोकि निम्नलिखित है। 

(1)- ए. वी. हम्बोल्ट ( आधुनिक भूगोल के जनक)

(2)- कार्ल रिटर

इससे पूर्व महान दार्शनिक काण्ट भूगोल को विज्ञान के रूप में स्थान दिलाने का प्रयास किया और भूगोल को 5 भागों में बांटा ।

आगे चलकर स्थानों एवं लोगों के वर्णन के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति मानव प्रतिक्रियाओं में विभिन्नता की व्याख्या भी भूगोल में की जाने लगी परंतु आगे चलकर मानव और प्रकृति के बीच संबंधों को लेकर भूगोलवेत्ता दो भागों में विभाजित हो जाते हैं ।

1- निश्चयवादी - जिन्होंने यह प्रतिपादित किया कि पर्यावरण, मानव और उसकी क्रियाओं को नियंत्रित करता है।

2- सम्भववादी- जिन्होंने यह कहा कि मानव नए नए अवसरों को प्राप्त करने के लिए पर्यावरण को अपने अनुकूल बदल सकता है।

इसी प्रकार क्रमबद्ध विकास करते हुए भूगोल बीसवीं शताब्दी में एक स्वतंत्र विषय के रूप में सामने आता है बीसवीं शताब्दी में भूगोल स्वतंत्र विषय के रूप में दो स्पष्ट भागों में विभाजित हो जाता है।

1- क्रमबद्ध भूगोल

2- प्रादेशिक भूगोल


ब्रह्मांड और सौरमंडल-

https://www.aakhirkyon.com/2021/05/Brahmand.html?m=1






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